कुंग-फू की विकासयात्रा व उपयोगिता
जूडो-कराटे की तरह कंग-फ आत्मरक्षा का एक प्रभावी साधन मात्र ही नहीं है आक्रमण का घातक तरीका भी है। यद्यपि इस कला का विकास भी जडो के समान ही चीन देश में बौद्ध भिक्षुओं ने ही किया था और उनका प्रमुख लक्ष्य मात्र आत्मरक्षा ही होता था। बौद्ध धर्म सन्यासियों को कोई भी अस्त्र शस्त्र रखने की आज्ञा नहीं देता अतः प्राचीन काल में एकदम खाली हाथ रहते थे। यात्राओं के दौरान प्रायः ही लुटेरे, डाकू और विधर्मी व्यक्ति उन पर आक्रमण भी कर ही देते थे। यही कारण है कि चीन और जापान में बौद्ध भिक्षुओं ने शत्रु मे निहत्थे ही लड़ने की विविध तकनीकों का आविष्कार किया। समय के साथ-साथ इन तकनीकों का न केवल विकास ही होता गया चीन और जापन के बौद्ध भिक्षुओं के लिए इम कला में दक्षता प्राप्त करना एक अनिवार्य कर्त्तव्य ही बन गया बौद्ध भिक्षुओं का उददेश्य मात्र आत्मरक्षा होता था वार करना नहीं अतः सदियों तक यह कला मात्रआत्मरक्षा का एक साधन ही बनी रही और वही कला आज जूडो के नाम से जानी जाती है।
योग साधना करने और तपस्वी का जीवन व्यतीत करने के कारण बौद्ध भिक्षुओं में ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित करने की क्षमता तो स्वाभाविक रूप से होती ही थी ब्रह्मचारी का सात्विक जीवन बिताने के कारण उनके हाथ-पैरों में पर्याप्त शक्ति एवं कठोरता भी होती थी। यही कारण है कि जब कभी आक्रमणकारी पर उनके हाथ या पैर की ठोकर पड़ जाती थी तब वह मर्मान्तक पीड़ा से त्रस्त होकर गिर पड़ता था। कालान्तर में खाली हाथों से ही आक्रांता को धराशायी करने की इस तकनीक ने एक जीवन्त कला (living art) का रूप ले लिया और इसे नाम दिया गया कराटे। कालान्तर में चीन देश के शासकों ने कराटे की इस कला को अपने सैनिकों को सिखलाना भी प्रारम्भ कर दिया। सैनिकों के हाथ में आजाने के पश्चात् आत्मरक्षा की इस कला ने आक्रमण की एक शैली का रूप ही धारण कर लिया। तेजी से आक्रमण करके निरन्तर तीव्रगति से लात और खड़ी हथेली की चोटें मार कर दुश्मन को धराशायी करने की नई से नई तरकीबों का समावेश इस कला में किया जाने लगा। इस प्रकार आत्मरक्षा की यह कला युद्ध की एक ऐसी तकनीक बन गई जिसका प्रयोग गोला-बारूद समाप्त हो जाने या निशस्त्र हो जाने पर सैनिक खुलकर करने लगे। आक्रमण की इस शैली को चीन में 'कुंग-फू-वू-जू' (Kung-Fu-Wu-Su) कहा जाता था। इस शब्द समूह का अर्थ है 'मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों का सामंरिक उपयोग।

